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सुपौल। भांय-भांय करती पछिया और झोपड़ी में साड़ी टांगकर सिकरहट्टा-मंझारी निम्न बांध पर सर्द इस हवा से जीवन रक्षा के लिए जद्दोजहद जारी है। इस बांध पर कोसी के विस्थापित सैकड़ों लोगों की बस्ती बसी है। सच तो यह है कि आग नहीं हो तो इस बस्ती से रोज लोगों की आबादी घटती जाएगी। पूस की रात में कुहासा सितम ढा रहा है और लोग घुटनों को पेट में घुसाए सुबह होने के इंतजार में रहते हैं। दुख की रात लंबी होती है और इस लंबी रात की सुबह कभी तो होगी यही भरोसा है यहां लोगों के जिए जाने का। प्रखंड क्षेत्र के सिसौनी छीट, जोबहा खास, घोघररिया पंचायत के अमीन टोला, खुखनाहा, माना टोला, लक्ष्मीनिया गांव से सैकड़ों की संख्या में कोसी की बाढ़ से विस्थापित हुए परिवारों का यहां आशियाना है। बाढ़ प्रभावित वैसे लोग जिनके पास पैसा है तो उनलोगों ने जमीन खरीद कर घर बसा लिया लेकिन जिसके पास पैसा नहीं है वे कई सालों से सुरक्षा बांधों पर और उसके किनारे झोपड़ी लटका कर जीवन यापन कर रहे हैं। बाढ़ के कारण साल दर साल यहां की आबादी बढ़ती जाती है। जीबू महतो, रामचन्द्र महतो, रामवतार महतो, प्रमोद कुमार मंडल, चंदर मंडल, राजीव कुमार यादव समेत सैकड़ों लोगों का कहना है कि बाढ़ में उनके घर कोसी में विलीन हो गए। तीन वर्षों से हमलोग इधर-उधर बाल-बच्चे व माल-मवेशी लेकर भटक रहे हैं। जमीन कोसी काट ले गई। बैंक से कृषि ऋण लिए थे नहीं चुका सके हैं। यही हाल सिसौनी पंचायत के सिसौनी छीट, जोबहा खास के सात, आठ, नौ और दस वार्ड के लोगों का है। विस्थापित का कहना है कि जमीन और घर कोसी नदी की तेज धारा में बह गया कुछ बचा नहीं। ऊपर वाले के रहमोकरम पर जी रहे हैं। कोई देखने वाला नहीं है। गर्मी-बरसात तो जैसे-तैसे काट लिए लेकिन अब पूस की रात काटनी मुश्किल हो रही है। घर में साड़ी टांगकर रहते हैं लेकिन पछिया साड़ी को कहां माननेवाली है। साड़ी को भेदकर जब हवा अंदर आती है तो शरीर में सुई सी चुभती है। दिनभर बच्चे इधर-उधर से खर-पतवार चुनकर लाते हैं और रातभर उसे जलाकर सुबह होने का इंतजार करते हैं। अब तो सुबह होने के बाद भी धूप नहीं निकलती है। ऐसा लगता है कि हमलोगों के लिए अब सुबह होगी ही नहीं।