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क्या हमने ऐसा कोई मामला सुना कि गरीब या दलित वर्ग से जुड़े दुष्कर्म, हत्या के मामले का सच सामने आ सका हो? वो भी किसी राजनेता के प्रयास से? वाकई किसी नेता ने बच्ची को न्याय दिलाने को अपने वोट बैंक की चिंता के चश्मे से नहीं, बल्कि उसके प्रति संवेदना से देखा हो? ऐसे मामले देशभर में महज अपवाद के तौर पर मिल सकते हैं। देश में हर दिन 80 से अधिक दुष्कर्म के मामले होते हैं। किसी एक जगह भी आवाज नहीं उठती। इस प्रकार से संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी टूट जाती हैं। जिस तरह के ढकोसले, कथित धरने, इंटरनेट मीडिया पर संवेदना जताने की तस्वीरें साझा की गईं, क्या ऐसा करने से पीड़ित वर्ग को न्याय मिल जाएगा। मतलब नेता कानून भी भूल गए। ऐसा पहले भी हो चुका है।